Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
वैराग्यरसपुष्टात्मा शास्त्रार्थप्रावृषान्वितः ।
स्वल्पेनैव स्वकालेन परामेति समुन्नतिम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
शास्त्रार्थरूपी वर्षा का जल पाकर वैराग्यरूपी रस से जब इसकी आत्मा खूब पुष्ट
हो जाती है तब यह अंकुर अपने थोड़े से ही समय में परम उन्नति को प्राप्त हो जाता है