Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
शास्त्रार्थसाधुसंपर्कवैराग्यरसपीवरः ।
रागद्वेषकपिक्षोभैर्न मनागपि कम्पते ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
वेदान्तशास्त्र के विचार, साधुओं की संगति तथा वैराग्यरूपी रस से जब यह खूब मोटा हो जाता
है तब राग -द्वेषरूपी बन्दरों के हिलाने-डुलाने से तनिक भी कम्पित नहीं होता