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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verses 30–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 30,31

संस्कृत श्लोक

विवेककल्पवृक्षे तु वर्धमाने दिने दिने । छायावितानवलिते पुंसो हृदयकानने ॥ ३० ॥ प्रवर्तते शीतलता तलतापापहारिणी । अभ्युल्लसन्मतिलता तुषारोदरसुन्दरी ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

पुरुष के दुश्यरूपी जंगल में छाया के वितान से वेष्टित इस विवेकरूपी कल्पवृक्ष के दिन-दिन बढ़ने पर हे श्रीरामचन्द्रजी, चित्तरूपी भूमि के आध्यात्मिक, आधिभौतिक तथा आधिदैविक तापों का हरण करनेवाली उल्लसित हो रही बुद्धिरूपी लता से तुषारगर्भ के समान एक सुन्दर शीतलता प्रवृत्त होती है