Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verses 32–33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
यस्यामवान्तरश्रान्तो विश्राम्यति मनोमृगः ।
आजन्मजीर्णपथिकः पथि कोलाहलाकुलः ॥ ३२ ॥
सत्तामात्रात्मशारीरचर्मार्थं प्रेक्षितोऽरिभिः ।
नानातासारसाकारगोपयज्जर्जरोन्मुखः ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
अनेक जन्मों के नानाविध दुःखों से जीर्ण, दैवात् सन्मार्ग प्राप्त हो जाने पर भी
नाना वादियों के कोलाहल से व्यग्र होकर उस मार्ग से भ्रष्ट एवं विभिन्न संसारप्रान्ता में घूमते रहने
से श्रान्त यह मनरूपी पथिक मृग इसी वृक्ष की शीतल छाया मेँ आकर विश्राम करता है