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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

संसारारण्यविसरद्वासनापवनेरितः । अहंतातापसरिता सर्वदा विप्रदारदी ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

एकमात्र सत्ता ही जिसकी आत्मा है ऐसे पुरुषरूपी चमड़े का अपहरण करने के लिए काम, क्रोध आदि छः व्याध इसके पीछे पड़े हैँ । अनेक प्रकार के असार शरीर आदि रूप कण्टको के कुंजों में बार-बार छिपकर यह अपने को बचाने की चेष्टा करता है | यहाँ तक कि उन कुजो में बार-बार छिपने की कोशिश करने से इस मृग का मुख उस शरीर के अन्दर वर्तमान नाना प्रकार के दोषरूपी काँटों से जर्जर हो गया है ॥३ ३॥ वासनारूपी पवन से प्रेरित संसाररूपी जंगल में दौड रहा यह मृग अहन्तारूपी मृगतृष्णा की ओर सदा दौड़ते रहने से अन्तःकरण के तृष्णारूपी विषके दाह से अत्यन्त व्याकुल हो गया है