Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
दीर्घादरी दूरचितसारसंचारजर्जरः ।
पुत्रपौत्रपरामर्शप्रतापात्पतितोऽवटे ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह मनरूपी मृग अनेक प्रकार के भोगो में आदर रखनेवाला है,
थोड़े में कभी सन्तुष्ट नहीं रहता । यही कारण है कि चाहे कितना ही दूर क्यों न हो, लेकिन वहाँ
भी उपजे हुए हरे-हरे तृणरूपी विषयों में बरावर दौड़ते रहने से इसका शरीर बिलकुल जर्जर हो
गया है । (क्या कहा जाय ?) यह तो पुत्र, पौत्र आदिकं के रात-दिन परिपालन की चिन्ता में ही
व्यस्त रहने के कारण आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक तीन तरह के तापों से अनर्थरूपी
गड्डे में जा गिरा है