Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
लक्ष्मीलताविलुठनात्संकटैः कुण्ठिताङ्गकः ।
तृष्णाश्रीसरितं गृह्णन्कल्लोलैर्दूरमाहतः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
सम्पत्तिरूपी लताओं में पैर फेस जाने से जब यह उठकर भागना चाहता
है तब पुनः लड़थड़ाकर गिर पडता है, इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, शत्रु, चोर तथा राजा आदि इसे
शीघ्र पकड़कर बाँध ले जाते हैं, खूब पीटते हैं तथा नाना प्रकार के दण्ड लगाते है । इन सब संकटों
से इसका शरीर अत्यन्त कुण्ठित हो गया है किसी काम का नहीं रह गया है । तृष्णारूपी सुन्दर
नदी का अवगाहन करनेवाला यह, क्षुधा, पिपासा, शोक, मोह आदिरूप तरंगों से दूर फेंक दिया
जाता है