Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 44, Verses 7–8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 44, verses 7–8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 7,8
संस्कृत श्लोक
शुद्धैः स्निग्धैः पवित्रैश्च मधुरैरात्मनोहितैः ।
सत्संगमनवक्षीरैरैन्दवैरमृतैरिव ॥ ७ ॥
अन्तःशून्यप्रदैः पूर्णैः स्वच्छैरमृतशीतलैः ।
विसृतैरमृताकुल्याशास्त्रार्थवरवारिभिः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वप्रथम बुद्धिमान पुरुष को सज्जनो की संग्रतिऊपी नवीन क्षीर से, तदनन्तर शाख़रूपी
अमृत से उसे स़रींचना चाहिये, यह कहते हैं ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि वह शुद्ध, स्नेहयुक्त, पवित्र, मधुर ओर
आत्मा के लिए हितकारक, चन्द्रमा के अमृत के सदृश सत्संगरूपी नूतन क्षीर से समाधि के बीज को
सबसे पहले सीचे । उसके बाद “नेति नेति" इत्यादि श्रुतियों द्वारा सम्पूर्ण द्वैत के निषेध से अन्तःकरण
को सांसारिक पदार्थों से शून्य बना देनेवाले, पूर्ण, स्वच्छ, सब तरह के तापों की शान्ति हो जाने
से अमृत की तरह स्वादिष्ट ओर शीतल तथा अमृत प्रवाह के नहर के तुल्य तत्त्वज्ञान के द्वारभूत
श्रवण-मननादिरूप शास्त्रार्थं के निर्मल जलों से समाधि के बीज को सीचे