Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
उन्मत्तचेष्टिताकारा हसत्यपि पुरोगताः ।
तरङ्गभङ्गुराधाराः संसारसरितो गतीः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
उन्मत्त के चेष्टित के समान
आकारवाली, सामने स्थित भी तरंग के समान क्षणभंगुर आधारवाली संसाररूपी मृगतृष्णा की नदी
की गति को मिथ्या समझकर वह हसता है