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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 45, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 45, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 45 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

न स चेतयते काश्चिल्लोकदारधनैषणाः । अपूर्वपदविश्रान्तो जीवन्नेव यथा शवः ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

अपूर्वं पद में विश्रान्त जीवन धारण कर रहा भी मृतक के सदृश वह योगी स्त्री, पुत्र आदि सांसारिक किसी पदार्थ की चिन्ता नहीं करता