Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
विवेकिषु विरक्तेषु संसारोत्तरणार्थिषु ।
जनः शीतलतामेति हिमहारगृहेष्विव ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
संसार पार पाने की इच्छा रखनेवाले विरक्त विवेकी पुरुषों
का समागम होने पर पुरुष ऐसी शीतलता प्राप्त करता है, जैसी हिम एवं पुष्पहारों से निर्मित घरों
में वास करने पर