Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
ननु नामरतोदारा या विवेकिनि विद्यते ।
सुरगन्धर्वकन्यासु मानवीषु न विद्यते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, जैसी उदार प्रीति विवेकी पुरुष में रहती है, वैसी उदार प्रीति देवता,
गन्धर्वं और मानव की कन्याओं मे भी नहीं रहती