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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 47, Verse 38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 47, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 47 · श्लोक 38

संस्कृत श्लोक

आसने शयने याने गमने रमणे जने । आधिचिन्तापरा एव ननु मूढा विदन्तु ताम् ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

जो मूढ पुरुष हैं; उनको पारलोकिक दुःखो का स्मरण भले ही न हो, पर ऐहिक दुःखों का तो उन्हें स्मरण करना ही चाहिए यह कहते हैं / भद्र, आसन के लिए, शयन के लिए,सवारी के लिए, जाने के लिए, आनन्द मनाने के लिए तथा अपने जन के लिए पुरुषों को कितनी बड़ी मानसिक चिन्ता बनी रहती है, इसलिए अज्ञानियों को उसे अवश्य स्मरण करना चाहिए कि अर्थोपार्जन के लिए यहाँ कितना दुःख है