Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
अनिशं पूजयन्त्येताः सर्वाः स्थावरजङ्गमाः ।
यथाभिमतदानेन सर्वे ते भूतजातयः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
सबका आराध्य भी आत्मा ही है, यह कहते हैं ।
ये जितने स्थावर-जंगम पदार्थ हैं और ये जितने प्राणी हैं, वे सब अपनी-अपनी इच्छा के
अनुसार उपहार सामग्री प्रदानकर उसी आत्मा का निरन्तर पूजन करते हैं