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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

सुबहून्येष जन्मानि यथाभिमतयेच्छया । यदा संपूजितस्तेन प्रसादमधिगच्छति ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

जब अनेक जन्मों तक यह आत्मा यथाभिमत इच्छा से पूजित होता है, तब वह उससे प्रसन्‍न हो जाता है