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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

स एष वासनात्मानं जन्तुं बोधयति क्रमात् । संसारसागरादस्मात्तारयत्यविवेकिनम् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

यही विवेक नामक दूत क्रमशः वासनारूप प्राणी को बोध देता है ओर अविवेकी को इस संसार-सागर से पार कर देता हे