Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 48, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 48, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 48 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
बोधात्मैषोऽन्तरात्मैव परमः परमेश्वरः ।
अस्यैव वाचको नाम प्रणवो वेदसंमतः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
समस्त जगत्
का प्रकाश करनेवाला ज्ञानरूप अन्दर का आत्मा ही सबसे बड़ा परमेश्वर है, वासनारूप आत्मा
नहीं । इसी परम परमेश्वर का बोधक वेदसम्मत प्रणव (ॐ) है