Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 49, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 49, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
पिण्डत्वं नास्ति भूतानां शून्यत्वं चाप्यसंभवात् ।
अत एव मनो नास्ति शेषं सत्तत्तव स्थितिः ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
दूसरी युक्ति बतलाते हैं ।
चार तरह के प्राणिसमूहों तथा पृथिवी आदि महाभूतों का एक-एक अवयव तथा एक-एक
गुण से विवेचन करके देखने पर इन दृश्य पदार्थों की, परमाणुभाव में विश्रान्ति न होने से इन
सभी जीवों में न तो पिण्डता है और न प्रत्यक्षादि के असंभाव से शून्यता ही है अर्थात् न तो
इन सब जीवों की कोई मूर्ति है और न ये सब शून्यरूप ही हैं । इन दोनों के न रहने से सम्पूर्ण
विकल्पों का नाश हो जाने के कारण विकल्पों के अधीन स्थितिवाला मन भी नहीं हे । इसलिए
निर्विकल्प सन्मात्ररूप स्फुरण ही अवशेष है । हे श्रीरामचन्द्रजी, वही आपका पारमार्थिक रूप
है ओर वही आपकी अन्तिम स्थिति हैं