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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 50, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 50, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । कस्मिंश्चित्प्राक्तने कल्पे कस्मिंश्चिज्जगति क्वचित् । केचित्सुप्ताः स्थिता देहैर्जीवा जीवितधर्मिणः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

पहले जीवट की आख्यायिका गे प्रदर्शित रीति को लेकर उनका लक्षण कहते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, किसी एक पूर्वकल्प में किसी एक जगत्‌ में कहीं पर कोई जीव सुषुप्ति अवस्था में ही स्थित थे, वे जीव अपनी-अपनी देहों के कारण जीवित ही रहे, मरे हुए नहीं थे