Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
शरदभ्रवदालूना मृगतृष्णाम्बुव्रत्तथा ।
पुनः संस्पृश्यमानैव बोधाद्गलति दृश्यता ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
शरत्काल के मेव के सदृश चारों ओर से
छिन्न-भिन्न हुआ मृगतृष्णाजल के सदृश मिथ्या प्रतीयमान तथा बार-बार स्पर्श आदि से जाना
गया भी जगत् आत्मज्ञान से तत्काल जल जाता है