Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
यथा दीप्तानले लीनं सुवर्णं घृतमिन्धनम् ।
एकतां याति विज्ञाने तथा भुवनचित्तदृक् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे धधक रही अग्नि में विलीन सोना,
घी ओर इन्धन एकरूप बन जाता है, वैसे ही विज्ञानकाल में भी जगत्-चित्त द्रष्टा आदि सब
एकरूप बन जाते हैं