Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 51, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 51, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 51 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
तनुभुवनगगनगिरिगणकरणपरं परममज्ञानम् ।
विगलति गलिते तस्मिन् सकलमिदं विद्यमानमपि ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
राघव, चूँकि जो सम्पूर्ण शरीर, शरीरों
के आधार भुवन, भुवनाधार गगन तथा विहार स्थान पर्वत है, उनके साधन ओर करणों का
एकमात्र कारण मूल अज्ञान ही है, दुसरा नहीं, इसलिए ज्ञान द्वारा अन्तःकरण से अज्ञान की
निवृत्ति हो जाने पर यह शरीर आदि जगत्, ज्ञानियों की दृष्टि से विद्यमान रहते भी विनष्ट हो
जाता है यानी असद्रूप बन जाता है