Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 53, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
निमेषे योजनशते प्राप्तायामात्मसंविदि ।
मध्ये तस्यास्तु यद्रूपं रूपं तस्य पदस्य तत् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसे निर्विषय चित्-स्वभाव की अत्यन्त अग्रश्निद्धि है, इस शका का अनुभव से निवारण
करते हैं।
उस निर्विषय आत्मपद का स्वरूप वही है, जो कि निमेषमात्र में सैकड़ों योजन तक
प्रमातृज्ञान के पहुँच जाने पर उस ज्ञान के बीच का रूप है । (इस विषय का पहले भी अनेक
स्थानों में निरुपण किया ग्या हैं -शाखाओं के अग्रभाग में चन्द्रदर्शन के समय एक निमिष्मात्र
में चक्ष की कृति के द्वारा ग्रमातृ-चैतन्य ऊपर ग्रदेश में सैको कोश चन्द्रदेश तक दूर चला
जाता है, वह ग्या हुआ प्रमाठ-वैतन्य बीच के प्रदेश में यानी शाखाग्रप्रदेश और ऊपर का
जो चन्द्रदेश है -इन दो ग्रदेशों के मध्यप्रदेश में एकदम विशुद्ध रहता हैं, उसमे कोड भी विषय
रहता ही नहीं. अतः मध्यप्रदेश के चेतन का जो भी रूप आप जानिये, वही रूप निर्विषय
आत्मपद का स्वरूप हैं)