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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 53, Verses 11–12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 53, verses 11–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 53 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

सबाह्याभ्यन्तरे शान्ते वासनाविषयभ्रमे । सर्वचिन्ताविहीनस्य प्रबुद्धस्यार्धरात्रतः ॥ ११ ॥ शान्तं निःसुखदुःखस्य पुरुषस्यैव तिष्ठतः । यदस्पन्दि मनोरूपं रूपं तस्य पदस्य तत् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

आधी रात तक याढ़ी नींद से मन की निद्राकरालिमा दूर हो जाती है, इस कालिमा के निकल जाने पर समाधि में स्थित हुए योगियों को उक्त रूप का अनुभव होने लय जाता है, यह कहते हैं। बाहरी और भीतरी जितने वासना के विषय भ्रमरूप पदार्थ हैं, उनका विनाश हो जाने पर सब प्रकार की चिन्ताओं से निर्मुक्त हुए तथा आधी रात में निद्रा से जगे, सुख-दुःख की वृत्तियों से तथा शान्तिपूर्वक समाधि लगाकर बैठे हुए पुरुष का जो स्पन्दशून्य (निर्मल) मनोरूप है, वही रूप उस पद का स्वरूप है । इस रूप का समाधिनिष्ठ पुरुष ही अनुभव करते हैं