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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

तदिदं तादृशं विद्धि सर्वम् सर्वात्मकं च यत् । देशाद्देशान्तरप्राप्तौ विदो मध्यमनङ्कितम् ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, इन सब बातों से यह आप अच्छी तरह जान लीजिए कि यह सर्वात्म जगतस्वरूप पहले जैसा निष्प्रपंच ब्रह्मरूप था, वैसा ही सदा रहेगा । इस तरह निष्प्रपंचस्वरूप शाखा और चन्द्र दोनों के दर्शनकाल में इनके मध्य में दर्शन से अभिव्यक्त चेतन प्रसिद्ध ही हे