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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

कारणेन विना कार्यं किल किं नाम विद्यते । यदपुत्रस्य सत्पुत्रदर्शनं स भ्रमो न सत् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

कारण के बिना कार्य ही कैसे ओर उसकी सत्ता ही क्या ? यदि दिखाई पड़ा तो वह भ्रम ही है । पुत्ररहित वंध्यापति को स्वप्न में अपने अच्छे पुत्र का जो दर्शन है, वह भ्रम ही है सत्य नहीं है