Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
शिलाजठरवत्सत्यं घनमेकमजं ततम् ।
सर्वं शान्तमनाद्यन्तमेक विधिनिषेधयोः ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई है, तो वह शिला के उदर के सदृश अत्यन्त
घन, बाधवर्जित, अद्वितीय, जन्मरहित, सर्वात्मक, शान्त, आदि अन्त से मुक्त तथा विधि एवं
निषेध में एकरूप ब्रह्म ही है, यही सर्वत्र विस्तृत है