Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 54, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 54, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
विभाग एव दृश्यत्वं द्रष्ट्रत्वं चैव गच्छति ।
एतच्च कल्पनं स्वप्नपुरादिष्वनुभूयते ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म का जीवरूप से विभाग कल्पित होने पर वह एक ही वस्तु चिदंश की प्रधानता से द्रष्टापन ओर
सदंश की प्रधानता से चिदंश को तिरोहित (छिपा) कर दुश्यपन धारण करती है । इस प्रकार की
कल्पना स्वप्न नगर आदि में अनुभूत होती है, वहाँ पर व्यावहारिक जीव से प्रातिभासिक जीव का
विभाग करने पर निद्रा से तिरोहित हुआ व्यावहारिक जीव स्वप्न का जीव, दृश्य, नगर आदिरूप
बन जाता है