Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 55, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
भाति केवलमेवेत्थं परमार्थघनं घनम् ।
यन्न शून्यं न वाऽशून्यमत्यच्छं गगनादपि ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार परमार्थघनरूप केवल ब्रह्म ही इस जगत् के रूप में भासता है, ब्रह्म न
शून्यरूप है और न अशून्यरूप है, वह आकाश से भी अत्यन्त स्वच्छ है