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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 55, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

साकारमप्यनाकारमसदेवातिभास्वरम् । अतिशुद्धैकचिन्मात्रस्फारं स्वप्नपुरं यथा ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वप्ननगर के सदृश साकार होता हुआ भी ब्रह्मचैतन्य वास्तव में निराकार है, निराकार होता हुआ ही अतिभास्वर यानी प्रकाशमय है और अतिस्वच्छ एकमात्र चितिस्वरूप होने के कारण अतिविस्पष्ट है