Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 55, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 55, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 55 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
निर्वाणमेवमिदमाततमित्थमन्तश्चिद्व्योम्न आविलमनाविलरूपमेव ।
नानेव न क्वचिदपि प्रसृतं न नाना शून्यत्वमम्बर इवाम्बुनिधौ द्रवत्वम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, चिदाकाश के अन्दर जगदात्मक जो कलुषित स्वरूप है, वह कहे गये मार्ग
से अकलुषित होकर व्यापक निर्वाणरूप ही बन जाता है । यह निर्वाणरूप आत्मतत्त्व कहीं पर
उपलब्ध नहीं होता, ऐसी बात नहीं है, किन्तु सर्वत्र उपलब्ध होता है यह जगत् नाना (भिन्न)
नहीं है, किन्तु आकाश में शून्यरूप के सदृश तथा समुद्र में द्रवत्व के सदृश अभिन्न है यानी
ब्रह्मरूप ही हे