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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 56, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । सर्वत्र सर्वथा सर्वं सर्वदा व्योम्नि चिन्मये । साधु संभवति स्वच्छं शून्यत्वं ख इवाखिले ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, चिन्मय आकाश में सर्वत्र ओर सदा सब कुछ किसी प्रकार के संकोच के बिना विद्यमान है ही, परन्तु वह है सर्वथा स्वच्छ । ब्रह्म जगत्‌ के मल से ऐसे दूषित नहीं होता, जैसे नीलरूप से भासमान शून्यता अपने मल से आकाश मेँ मलिनता पैदाकर उसे दूषित नहीं करती

सर्ग सन्दर्भ

पचपनवाँ सर्ग समाप्त छप्पनवाँ सर्ग चिति ही सब कुछ है ओर सर्वत्र ही सर्वात्मक चिति है, इस निश्चय को दृढ़ बनाने के लिए पाषाणआख्यायिका का वर्णन।