Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 56, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
यत्र चित्तत्र सर्गश्रीरव्योम्नि व्योम्नि वास्ति चित् ।
चिन्मयत्वात्पदार्थानां सर्वेषां नास्त्यचित्क्वचित् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
ङस अर्थ में युक्ति दिखलाते हैं /
भद्र, जहाँ चिति है, वहाँ पर ही जगत् की शोभा है, चाहे पृथ्वी आदि पदार्थ हो, चाहे आकाश
हो सर्वत्र चित् विद्यमान है, क्योंकि सभी पदार्थ तो चितिरूप हैं, अतः कहीं पर चित् नहीं है यह नहीं
हो सकता