Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 56, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
तस्मात्को नु प्रदेशः स्यादत्यन्तं शून्यतां गतः ।
यत्रैता नानुभूयन्ते पञ्च बाह्यार्थवेदनाः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
मुझे जहाँ समाधि लगानी है; वह उत्तम प्रदेश कौन हो सकता है, क्योकि वह प्रदेश अत्यन्त
शून्यरूप और समाधि के लिए उपयोगी होना ही चाहिए । उस प्रदेश में बाह्य अर्थो के विज्ञान,
जो पाँच इन्द्रियों से उत्पन्न होने के कारण पाँच प्रकार के हैं, रहने भी नहीं चाहिए