Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 56, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
शब्दकाननवार्यब्दभूतौघाभिसमाकुलाः ।
क्षोभयन्त्यथ संक्षुब्धास्तस्मान्मे गिरयोऽरयः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
पर्वत, शिखर आदि अनेक एकान्त प्रदेथ समाधि के लिए है ही, किर उनमें ही कास क्यों न
किया जाय, इस पर कहते हैं ।
विक्षेप पैदा करनेवाले शब्दों से आक्रान्त अरण्य, जल, मेघ एवं सिंह आदि प्राणियों से चारों
ओर व्याकुल पर्वतों को मैं अपना शत्रु ही समझता हूँ, क्योंकि वे उनसे स्वयं ही क्षुब्ध होकर दूसरों
को क्षुब्ध कर देते हैं, अतः वे प्रतिकूल हैं