Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 56, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
गायन्त्यनिलभांकारैर्नृत्यन्ति लतिकाः करैः ।
पुष्पैर्हसन्त्यगेन्द्राणां गुहा गहनकोटराः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
पर्वतो की ग॒फ़ाओं का तब सेवन करना चाहिए, इस पर कहते हैं ।
बड़े-बड़े पर्वतो की गहन छिद्रवाली गुफाएँ तो वायुओं के भाँकारशब्दों से गान करती हैं,
लतिकारूपी हाथों से नृत्य करती हैं ओर वनवृक्षों के फूलों से हँसती हैं, अतः वे भी विक्षेपकारक
ही हैं