Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 56, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
अत्यन्तमन्दपवनं स्वप्नेऽप्यप्राप्यभूतकम् ।
मङ्गलोत्पातरहितमगम्यं विद्धि संसृतेः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, उस प्रदेश में अत्यन्त मन्द पवन बह रहा था, स्वप्न में भी भूतगण वहाँ नहीं पहुँच
सकते थे, शुभचिन्ह और अशुभ चिन्हों से रहित तथा संसारियों को वह अगम्य था, यह जान
लीजिये