Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 56, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 56, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 56 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
विरसा खल्वियं लोकस्थितिरापातसुन्दरी ।
न जातु सुखदा मन्ये कस्यचित्केनचित्क्वचित् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जो लोकों की अवस्था है,
वह वस्तुतः नीरस ही है, केवल ऊपर ऊपर से सुन्दर लगती है, इसलिए मैं मानता हूँ कि यह किसी
को, कहीं, किसी हेतु से किसी समय भी सुखकारक नहीं हो सकती