Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
संकल्पेनाम्बरे यद्वद्दृश्यते विटपादिकम् ।
स संकल्पस्तथाभूतो न तत्रास्ति पदार्थता ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि वह छरष्टि उत्पन्न ही नहीं है, तो फिर कोन उत्त रूप से भाता है. उसको दुष्टान्तपूर्वक
बतलाते हैं ।
जैसे संकल्प द्वारा आकाश में वृक्ष आदि दिखाई देते है, वैसे ही संकल्पमय यह संसार भी है।
इसमें वस्तुतः पदार्थता नहीं है