Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
एवं येयं चिदाकाशे सर्गादावनुभूयते ।
शून्यरूप इवाकाशे सर्गस्थितिरनर्गला ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
एवं सृष्टि के आरम्भकाल में जो यह अर्गलाशून्य सृष्टि की
स्थिति चिदाकाश में अनुभूत होती है, वह भी आकाश में शून्यरूप वृक्षादि के सदृश ही है