Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
अहंभावस्य संशान्तिरेषाऽसौ कथिता तव ।
अहंभावः परिज्ञातः पिशाच इव शाम्यति ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञान रहने पर ही अहंभाव बाधा पहुँचाता है, ज्ञान होने पर नहीं; यह कहते हैं ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, इस तरह मैंने आपसे यह अहंकार की शान्ति कही । यह अहंकार भलीभाँति
ज्ञात होने से बालकल्पित पिशाच की तरह शान्त हो जाता है