Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
मया त्वेवमहंभावः परिज्ञातो यदाखिलः ।
तदा मे विद्यमानोऽपि निष्फलः शरदभ्रवत् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
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इस तरह जब इस अहंकार को मैं पूर्णतया जानता हूँ, तब हे श्रीरामचन्द्रजी यह रहनेपर भी मेरे
लिए शरत्काल के मेघ के सदृश निष्फल ही रहता है