Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 57, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 57, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 57 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
चित्राग्निदाहो विज्ञातो यथा दाह्येषु निष्फलः ।
तथाहंभावसर्गादि ज्ञातं निष्फलतामियात् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्रलिखित अग्नि में अध्यस्त दहन
क्रिया जैसे दाह्य वस्तुओं मे निष्फल होती है, वैसे ही अहंभाव की सृष्टि आदि भी पूर्णरूप से ज्ञात
होने पर निष्फलता को प्राप्त होती है