Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 58, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 58, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 58 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
खं नाणुमात्रमप्यस्ति सर्गैर्निर्विवरं न यत् ।
न च क्वचन सर्गास्ते सन्ति ब्रह्मखमेव तत् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
अणुमात्र भी आकाश सृष्टियों से रहित हो,
ऐसा नहीं है, किन्तु सब सृष्टियों से परिपूर्ण है और वे सृष्ट्यां भी नहीं है, किन्तु वे
ब्रह्माकाशमात्ररूप ही हैं