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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

अनुभूतेर्भ्रमात्मत्वात्कारणानामभावतः । पृथ्व्यादीनामहेतूनामत्यन्तं सन्त्यसन्ति च ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

वास्तव में कारणों के अभाव से कारणरहित पृथ्वी आदि का अनुभव तो भ्रमात्मक है, इसलिए ब्रह्मरूप अधिष्ठान की सत्ता लेकर ही वे सब जगत्‌ विद्यमान हैं, उसे न लेकर वे अपने स्वरूप से तो हैं ही नहीं