Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
मृगतृष्णाम्बुभरवद्द्विचन्द्रव्योमवर्णवत् ।
संपन्नानि न सत्यानि सत्यान्यप्यनुभूतितः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
मृगतृष्णाजल के प्रवाह के सदृश अथवा दो चन्द्रयुक्त आकाश के वर्णं के ये जगत्
भ्रमरूप अनुभव से ही उत्पन्न हुए हैं, अतः वे सत्यरूप अधिष्ठान की सत्ता से सत्यरूप हैं, अपने
स्वरूप से वे सत्यरूप नहीं हे