Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
क्षीराम्बुधेर्जलानीव स्नेहसाराणि सर्वतः ।
तरङ्गभङ्गुराण्यन्तर्बहिश्चावृत्तिमन्ति च ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
ये सब क्षीरसागर के जल के सदृश चारों ओर स्नेह (प्रीतिरूप) सार से पूर्ण, तरगों के
सदृश भंगुर तथा भीतर और बाहर से परिवर्तनशील हैं