Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 59, verse 60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
वृक्षरूपाणि पत्राणां बुद्ध्यहंकारचेतसाम् ।
असतामप्यसन्त्येव स्वप्ने न्यस्तनृणामिव ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
ये
जगत् बुद्धि अहंकार और चित्तरूपी पत्तों के लिए एक तरह से पेड ही हैं । तथा जैसे स्वप्न में
निरन्तर अस्त स्वभिन्न मनुष्यों के दृश्य असत्य हैं, वैसे ही स्वभिन्नरूप से देखनेवालों को भी
साधारणरूप होने के कारण वे असत्य रूप ही हैं