Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
निरोद्धुं न च शक्नोमि स्पर्शलम्पटतां त्वचः ।
ग्रीष्मकालसमिद्धस्य तापमंशुमतो यथा ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
भगवन्, त्वगिन्द्रिय की स्पर्शलम्पटता को मैं ऐसे रोक नहीं सकता, जैसे
ग्रीष्मकाल के प्रदीप्त सूर्य के ताप को