Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 6, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 6, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 6 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
शुभशव्दरसार्थिन्यो मुनेः श्रवणशक्तयः ।
मां योजयन्ति विषमे तृणेच्छा हरिणं यथा ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने, सुन्दर शब्द का आस्वाद लेने की
अभिलाषावाली श्रवण की शक्तियो मुझे विषम परिस्थिति में ऐसे ढकेल देती हैं, जैसे कोमल
तृण खाने की इच्छाएँ हरिण को तृणों से ढके भयंकर कूप में ढकेल देती हैं